प्राणायाम की रहस्यमयी शक्ति
प्राणायाम की रहस्यमयी शक्ति
-राजीव नयन पाठक
गुरु: “आरव! सुनो, प्राणायाम केवल श्वास लेना और छोड़ना नहीं है। यह चित्त और शरीर की शुद्धि का सर्वोच्च अभ्यास है। श्वेताश्वतरोपनिषद् कहता है—
'प्राणायामके द्वारा जिसके मनकी अशुद्धि क्षीण हो जाती है उसीका चित्त ब्रह्ममें स्थिर होता है।'
याद रखना, जब मन शुद्ध होगा, तभी चित्त ब्रह्म में स्थिर होगा।”
आरव: “गुरुजी, लेकिन यह शुद्धि कैसे होती है?”
गुरु: “आरव, इसे महसूस करना आसान है। जब प्राणायाम करते समय तुम्हारा शरीर हल्का और मन शांत महसूस होगा, तभी समझो अभ्यास सफल हो रहा है।”
1. नाड़ीशोधन: पहला कदम
गुरु: “आरव, सबसे पहले नाड़ियों को शुद्ध करना सीखो। इसे नाड़ीशोधन कहते हैं। इसे ध्यान से करो—
'दायें नासारन्ध्रको अँगूठे से दबाकर बायें से यथाशक्ति वायु खींचे। तत्पश्चात् ... बांयी नासिकाको उंगलीयों से दबाकर दांयी नासिका से वायुको बाहर निकाले। पुनः दायें नासारन्ध्र से वायु खींचकर बायेंसे वायुको बाहर निकाले।'
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सुबह, दोपहर, शाम और आधी रात में तीन-तीन या पाँच-पाँच बार करो।
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सीधा बैठो, रीढ़ सीधी, हाथ घुटनों पर, आँखें बंद।
आरव: “गुरुजी, इसे करते समय कुछ महसूस नहीं होता।”
गुरु: “आरव! आरंभ में थोड़ा समय लगेगा। धीरे-धीरे नाड़ियाँ शुद्ध होंगी और श्वास नियंत्रित होगी।”
2. प्राणायाम के तीन प्रकार
गुरु: “अब ध्यान दो। प्राणायाम में तीन मुख्य क्रियाएँ हैं—
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रेचक – वायु बाहर छोड़ना।
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पूरक – वायु अंदर खींचना।
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कुम्भक – वायु को रोककर स्थिर रखना।
श्लोक भी यही कहता है—
'रेचकं प्रथमं विद्धि, द्वितीयं पूरकं विदुः, तृतीयं कुम्भकं प्रोक्तं प्राणायामस्त्रिरात्मकः। त्रयाणां कारणं ब्रह्म भारूपं सर्वकारणम्।'
आरव: “तो गुरुजी, तीनों का सही क्रम बहुत जरूरी है?”
गुरु: “हाँ आरव, यह क्रम ही प्राणायाम की शक्ति है। इसे सही तरीके से करना सीखो।”
3. अभ्यास के व्यावहारिक तरीके
गुरु: “आरव, इसे ऐसे करो—
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पहले १६ गिनती तक पूरक।
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फिर ६४ गिनती तक कुम्भक।
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अंत में १६ गिनती तक रेचक।
श्लोक:
'पूरयेत्षोडशैर्मात्रै-रापादतलमस्तकम्, मात्राैर्द्वात्रिंशकैः पश्चा-द्रेचयेत्सुसमाहितः, सम्पूर्णकुम्भवद्वायो-निश्चलं मूर्धदेशतः।'
आरव: “गुरुजी, इतनी लंबी गिनती क्यों?”
गुरु: “आरव, धीरे-धीरे और गहरी श्वास लेने से ऊर्जा नियंत्रित होती है और मन स्थिर होता है। अभ्यास के साथ यह सहज हो जाएगा।”
4. लाभ
गुरु: “आरव, प्राणायाम से शरीर हल्का, मन शांत और दोष दूर होंगे। श्वेताश्वतरोपनिषद् कहता है—
'प्राणायामैर्दहेद्दोषान्, धारणाभिश्च किल्बिषान्। प्रत्याहाराच्च संसर्गान्, ध्यानेनानीश्वरान्गुणान्।'
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रोज़ सुबह या शाम 15–20 मिनट प्राणायाम करो।
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मन को एक जगह केन्द्रित रखो।
आरव: “गुरुजी, क्या इससे मैं आध्यात्मिक अनुभव भी पा सकता हूँ?”
गुरु: “बिलकुल आरव! यह अभ्यास मन और प्राण दोनों को नियंत्रित कर ब्रह्मानुभूति की ओर ले जाता है।”
5. गुरु की कालजयी शिक्षा
गुरु: “आरव, इसे मन, श्रद्धा और नियमितता से करो। श्वेताश्वतरोपनिषद् कहता है—
'मनसा प्रार्थितं याति सर्वप्राणजयी भवेत्।'
जब तुम इसे समझकर करोगे, सभी प्राण तुम्हारे अधीन होंगे। जीवन में शांति, शक्ति और आध्यात्मिक अनुभव स्वतः प्रकट होंगे।”
आरव: “धन्यवाद गुरुजी, अब मैं इसे रोज़ अभ्यास में लाऊँगा।”
गुरु: “याद रखना आरव, शुद्ध चित्त और नियंत्रित प्राण ही ब्रह्मानुभूति का मार्ग हैं। इसे कभी मत छोड़ना।”
हर हर महादेव 🙏
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