शुम्भेश्वरनाथधाम स्थित चिताभूमि

शुम्भेश्वरनाथधाम स्थित चिताभूमि

शुम्भेश्वरनाथ धाम के उत्तर दिशा में स्थित वह भूमि — जहाँ केवल पंडा समाज का दाह संस्कार होता है — किसी सामान्य श्मशान भूमि की भाँति नहीं, अपितु रहस्यमय साधना स्थली है। मुखाग्नि संस्कार संपन्न होते ही अग्नि शव को भस्म में रूपांतरित करने लगती है। शव पंचतत्त्वों — जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश — में विलीन होने लगता है - आत्मा शिव की अनंत चेतना में प्रवेश कर जाती है। यह दृश्य जीवन-मरण के अद्वैत का सन्देश देता है। यहाँ साक्षात्कार होता है- 'ददाति प्रतिगृह्णाति' की उस शाश्वत प्रक्रिया का, जिसमें देने वाला और लेने वाला, जीव और शिव — एकत्व को प्राप्त हो जाते हैं।

भस्मीभूत शव में भी शिवत्व स्पंदित है। यह वही भस्म है जिसे भगवान शिव अपने शरीर पर धारण करते हैं — “चिता-भस्म-लेपो”। बाबा शुम्भेश्वरनाथ धाम के इस भस्ममिश्रित हर रजकण में केवल पुनर्मिलन का उत्सव है — शिव की गोद में नव-सृजन पूर्व का अल्प विश्राम है। 

तस्मात् "ऋतं स्मर, कृतं स्मर”।

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्। विहितमविहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥

हर हर महादेव 🙏 जय बाबा शुम्भेश्वरनाथ 🙏

अस्तु 🙏 





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