बाबा शुम्भेश्वरनाथ धाम की दीपदेवी- संझामाई

बाबा शुम्भेश्वरनाथ धाम की दीपदेवी- संझामाई

-राजीव नयन पाठक 





आप बाबा शुम्भेश्वरनाथ धाम के गर्भगृह में गए ही होंगे। वहाँ की शांति में जब मन स्थिर होता है, तब सबसे पहले दृष्टि जिस दिव्य दृश्य पर ठहर जाती है, वह है — दीपदेवी- संझामाई।

कमलासन पर सीधी खड़ी, ठोस कांस्य से निर्मित वह प्रतिमा — नारी रूप में साकार हुई श्रद्धा-भक्ति की अद्भुत अभिव्यक्ति है।

साड़ी पहने, जिसकी प्रत्येक फोल्ड और प्लेट्स अद्भुत स्पष्टता से उकेरी गई हैं। आंचल बाएँ कंधे से पीछे की ओर गया है, कमर के नीचे तक झूलता हुआ। बाल कंघी से संवारे हुए, मुख पर मृदु मुस्कान, खुली आँखों में स्थिर ध्यान की आभा। नयनों में तीखापन भी है और ध्यान -गांभीर्य भी। कानों के प्रत्येक फोल्ड्स सूक्ष्मता से गढ़े गए हैं, पर कोई आभूषण नहीं  -  सौम्य मुख मंडल - शीलाभूषणा स्वरूपा ।

उसके दोनों हाथों में टिका है एक अंडाकार दीपक — लगभग पाँच सौ मिलीलीटर घृत धारण करने की क्षमता वाला, ठोस धातु का । वही दीपक जो प्रतिदिन प्रातः पूजा आरंभ होते ही  प्रज्वलित किया जाता है, और जिसकी लौ दिन-रात गर्भगृह में जलती रहती है। वैदिक काल से ही दीप ज्योति के समक्ष जनकल्याणार्थ तथा आत्मोन्नति के लिए हमारे सविनय याचना के स्वर गूंजायमान होते रहे हैं-

"अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम।।(यजुर्वेद)

वह लौ केवल दीपक की नहीं, युगों की साधना की लौ है। सदियों पहले जब बिजली नहीं थी, जब यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था, तब यही दीपक गर्भगृह का एकमात्र आलोक था। उस समय पंडा और सेवक हाथों में मशाल लिए, नगाड़ा बजाते हुए मंदिर तक पहुँचते थे। वायु में सीलन, पत्तों की सरसराहट, कभी दूर से किसी वन्य पशु की गर्जना - पर वे निडर होकर बढ़ते थे, क्योंकि उनके हाथ की मशाल और गर्भगृह की स्थिर लौ के बीच एक अलौकिक तारतम्य था।

जब वे गर्भगृह में प्रवेश करते, तो दीपदेवी के हाथों में प्रज्वलित दीपक की निश्चल एकाग्र लौ उनका स्वागत करती। बाहर के मशाल की लौ चंचल-गति थी, भीतर की लौ - प्रशांत! बाहर मशाल थी — रक्षा की; भीतर दीप था — मन-बुद्धि-चित्त के संतुलन का साधन - तथा अनमोल रत्नों का प्रदाता! यथा- 

अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्॥(ऋग्वेद)

अर्थात् - “मैं उस अग्नि की स्तुति करता हूँ जो यज्ञ का पुरोहित है, देवताओं का प्रतिनिधि है, और अनमोल रत्नों का दाता है।”

दीपदेवी के हाथों की यह प्रज्वलित लौ - हमें शुभ मार्ग पर ले जाने वाली, हमें सत्य की और अग्रसर रखता हुआ नीर-क्षीर विवेकी बनाने को कृतसंकल्पित है। दीपदेवी संकल्पित है - हमारे जीवन के अन्धकार को दूर कर हमें सन्मार्ग दिखाने को।

आज जब मंदिर बिजली से आलोकित है, तब भी गर्भगृह के केंद्र में वही दीपक जलता है। दीपदेवी की हथेलियों पर रखा वह दीपक सदियों से उज्जवल है, वह साक्षी है — अनगिनत श्रृंगार -आरतियों की, भक्तों के प्रणामों की, फुलायशों की, मुखर अथवा मौन ध्यानों की। वह लौ आज भी बीते युग के साधकों, भक्तों, सेवकों की याद दिलाती है- श्रद्धावान , चैतन्य।

जब मैं बाबा शुम्भेश्वरनाथ का ध्यान करता हूँ, चाहे जहाँ रहूँ, मुझे वही दीपक स्मरण आता है —उसकी लौ की आभा में चमकते बाबा के मस्तक पर का श्रृंगार, बिल्वपत्रों से सुसज्जित तथा उनके बीच में झलकता शिवलिंग, और गर्भगृह में व्याप्त वह अलौकिक सुगंध — जो फूल, विल्वपत्र, धूप, घृत चंदन - अगरू सहित हमारी आस्था के अनमोल संगम से उठती है। उस क्षण का अनुभव मेरी स्थूल वैखरी स्फोट से निर्वचनीय है।

कला की दृष्टि से दीपदेवी की यह प्रतिमा अद्वितीय है। इस प्रतिमा का निर्माण जिस भी तकनीक से किया गया हो- संतुलन,  सूक्ष्मता तथा धातुकर्म की ऐसी परिपूर्णता विरले ही देखने को मिलती है। यह ठोस कांस्य मूर्ति जैसे आधुनिक विज्ञान को चुनौती देती हुई खड़ी है — न टूटी, न झुकी, न इसकी चमक मंद हुई।

मेरी दृष्टि में इस प्रकार की प्रतिमा — दीपधारण करती स्त्री आकृति — भारत के अन्य किसी शिवमंदिर में दुर्लभ है। कहीं दीपस्तंभ हैं, कहीं दीपदान, कहीं दीपलक्ष्मी की छोटी मूर्तियाँ — पर ऐसी अखण्ड, स्थिर, जीवंत दीपदेवी केवल बाबा शुम्भेश्वरनाथ धाम में ही विद्यमान है।

बाबा शुम्भेश्वरनाथ के समक्ष दीपदेवी से हमारी प्रार्थना है-

"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय।”

अंधकार से प्रकाश की ओर,

अज्ञान से ज्ञान की ओर,

मृत्यु से अमरत्व की ओर हमें ले जाना ही दीपदेवी की अनादि साधना है।

🙏जय बाबा शुम्भेश्वरनाथ 🙏

🙏दया करॅ है दीन पर भगवन🙏

हर हर महादेव

(मेरे विशेष अनुरोध पर मेरे भाई सुमित पंडा  ने सारी तस्वीरें भेजी हैं, उसे आशीष)

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