कालिदास का प्रेम - प्राकट्य
कालिदास का प्रेम - प्राकट्य
- राजीव नयन पाठक
कभी-कभी प्रेम किसी विचार से नहीं, किसी तर्क से नहीं-सिर्फ एक क्षण से जन्म लेता है। एक ऐसी चमक जो आंखों में उतरकर हृदयंगम हो जाती है। आंखों से हर चेहरे में उसी का चेहरा नजर आता है। चित्त की वृत्ति ही उसी चित्र को ढूंढती है। मस्तिष्क की आंखों में उसी का चेहरा घूमता रहता है, हृदय का खालीपन मन एवं चित्त को उसी पर केंद्रित रख मानो लट्टू की तरह खड़ा दिखता है। मैं जब भी कालिदास की कथा पढ़ता हूॅं - मंदाकिनी, कालिमठ, कालीगंगा, और उन पहाड़ों की नीरव गोद—तो मन में बार-बार वही एक संकल्पना उभरती है: प्रेम का वह क्षण, जिसे लोग पहली नज़र का प्रेम कहते हैं, पर जिसे मैं हृदय की पहली धड़कन के अनुभव की सुखद, गुदगुदी-पूर्ण टीस कहना पसंद करता हूं।
वही धड़कन जिसने एक किशोर को अपनी जगह से उठाया, घर की चौखट से बाहर भेजा, और अंततः एक महाकवि बना दिया।
कहते हैं, वह लड़का-जिसे आगे चलकर कालिदास बनना था-पहाड़ों के बीच घूमता था। हवा में उसकी गुनगुनाहट घुलती थी और अपने आप में एक जादू बिखरते रखती थी। लोग कहते थे कि जब वह कोई भी सुर छेड़ता, तो आसपास खड़े बूढ़े-बच्चे सब उसी में खो जाते। और तभी एक दिन—उसी गुनगुनाहट के बीच—उसने 'पार्वती' को देखा।
बस… देखने भर की बात थी। आंखें चार हो गई।
प्रेम बोलना नहीं चाहता; वह तो सिर्फ एक झलक चाहता है।
वह लड़की गानेवालों की बस्ती की थी। सौंदर्य मानो प्रकृति ने बड़े मन से रचा था। उसकी चाल में पहाड़ी नदी की लय थी और स्वर में कालीगंगा की शीतल शंका। उस क्षण किशोर कालिदास के भीतर कुछ टूटकर कुछ जुड़ गया। मन स्थिर भी हुआ और अव्यवस्थित भी। प्रेम की यही तो अद्भुत प्रकृति है-वह संयोग भी है और वियोग की शुरुआत भी।
पर यह प्रेम सरल नहीं था।
जैसे आया, वैसे ही अचानक छीन लिया गया।
एक दिन वह लड़की गायब हो गई।
बिना कोई निशान छोड़े।
बस उसका गुनगुनाया हुआ एक गीत शेष रह गया—जो किशोर कालिदास के भीतर हर क्षण अनहद नाद की तरह गूंजता रहा।
फिर शुरू हुआ वह भटकाव - जो दिखने में भटकाव था, पर असल में आत्मयात्रा थी।
वह कालिमठ से चला, फिर मंदाकिनी का किनारा, फिर अलका, फिर मालिनी के तट, फिर काशी, कश्मीर, उज्जैन, बंगाल, रामेश्वरम्, और अंत में समुद्र पार श्रीलंका तक।
दुनिया कहती है वह जगह-जगह ज्ञान की खोज में गया।
पर मैं जानता हूं-और आप भी अपने अनुभवों से मुस्कुराते हुए कर ही सकते हैं-कि वह एक उन्मुक्त किशोर की प्रेम-यात्रा थी।
वह उस सौंदर्य को खोज रहा था जो उसके हृदय में घर बना चुका था।
वह उस स्वर को ढूंढ़ रहा था जिसने कभी उसका मन हिला दिया था।
वह उस सुगंध को तलाश रहा था जिसे एक क्षण की झलक ने उसकी आत्मा तक पहुंचा दिया था।
और जब कोई प्रेम इतना गहरा हो जाए, कि उसका वियोग स्वयं सृष्टि की भाषा बन जाए-तभी जन्म लेता है मेघदूतम्।
मैं जब मेघदूत पढ़ता हूं तो मुझे उसमें विद्वान् कालिदास नहीं दिखता।
मुझे उसमें वही लड़का दिखता है - नंगे पैर, पहाड़ों की पगडंडियों पर चलता हुआ, एक खोई हुई धुन को सुनने की कोशिश करता हुआ, बादलों से विनती करता हुआ कि-
“मेरे संदेश को उस तक पहुंचा देना…
कहीं वह दूर, किसी अज्ञात प्रदेश में, मेरी प्रतीक्षा कर रही हो।”
यही है पहला प्यार का स्वरूप-
जल की तरह सरल,
अग्नि की तरह तेज,
आकाश की तरह विस्तृत।
और मैं सोचता हूं-
शायद प्रेम का सबसे पवित्र रूप वही है जिसमें खोने का दर्द कविता बन जाता है,
और प्रतीक्षा की अदृश्य ज्वाला मेघ बनकर बरस पड़ती है।
इसलिए, कालिदास का प्रेम सिर्फ एक किशोर का प्रेम नहीं था।
वह तो वह शक्ति थी जिसने एक मनुष्य को महाकवि बना दिया।
और मेघदूत…
वह तो उसकी आत्मा का उद्गार है -
जहां हर शब्द एक मिलनोत्सुक आह है, और हर भाव एक न-मिलन की पीड़ा।
कभी-कभी सोचता हूं-
प्रेम किसी व्यक्ति से नहीं, किसी क्षण से होता है।
पर
उस क्षण की स्मृति ही जीवन को महाकाव्य बना देती है।
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