जब लिखने का मन न हो, तब क्या लिखें?

जब लिखने का मन न हो, तब क्या लिखें?

-राजीव नयन पाठक 

कभी-कभी ऐसा लगता है कि दिमाग छुट्टी पर चला गया है और हमारा पेन-पेपर या की–बोर्ड खाली सड़क पर खड़े स्ट्रीट लाइट की तरह अकेला-अकेला चमकता रह जाता है। लिखने का मन ही नहीं करता! लेकिन होमवर्क तो जमा करना है, प्रोजेक्ट भी बनाना है, और अगर आप थोड़े ‘राइटर टाइप’ हो तो डायरी भी बुलाती रहती है—“आओ, कुछ तो लिखो!”

तो ऐसे मुश्किल, डरावने और आलसी पलों के लिये—ये रहा टीनएजर्स का अल्टीमेट गाइड!

1. मन नहीं है? ठीक है—पहले मन को मनाने का काम करें!

हां, लिखने का मन नहीं है तो मन को थोड़ा दुलार दो।

“चलो भाई, सिर्फ पाँच मिनट… बस पाँच!”

मन को टाइम-पास समझ कर काम करवाओ, ये अक्सर मान जाता है। पांच मिनट की ये मीटिंग कभी-कभी पैंतीस मिनट तक खिंच जाती है—और पता भी नहीं चलता!

2. लिख नहीं पा रहे? जो सोच रहे हो वही लिख डालो

यह ब्लॉग भी इसी से जन्मा है।

दिमाग कहे—“कुछ नहीं आता…”

तो हाथ लिख दे—“कुछ नहीं आ रहा है, लेकिन मैं कोशिश कर रहा हूं।”

पहली पंक्तियाँ भले अजीब हों, पर वहीं से असली लिखाई निकलती है।

3. विषय नहीं मिल रहा? अपने कमरे को देखें!

आपके कमरे में ही हजार विषय छिपे होते है-

वो किताब जो आधी पढ़ी-आधी खो गई, 

वो चार्जर जो हमेशा गुम रहता है,

वो कपड़े जो कुर्सी पर स्थायी घर बना चुके हैं, और वो माँ की तेज आवाज, जो हर 10 मिनट में कहती है—“कमरा साफ कर!”

कुछ भी उठाएं, कहानी बनाएं, ब्लॉग तैयार!

4. मूड नहीं बन रहा? मूड को चाय पिलाओ!

चाय, कॉफी, चॉकलेट—तीनों आपकी क्रिएटिविटी के तीर्थ हैं।

बहुत से महान लोग इन्हीं पे चलकर दुनिया बदल गये… हम तो बस एक ब्लॉग लिख रहे हैं!

5. छोटी-छोटी बातें—बड़ी लिखाई

टीनएजर्स के पास मज़ेदार चीज़ों का खजाना होता है-

स्कूल की छुट्टी, गेम में जीता हुआ मैच, 

वो दोस्त जिसने कल 10 रुपये उधार लिये थे और वो जिसने वापस नहीं किये, इत्यादि।

इन सब पर लिखें! छोटे अनुभव बड़ी कहानियाँ बन जाते हैं।

6. लिखने की इच्छा लौटाने का अनुभूत तरीका—माइंडफ्री राइटिंग

पेन पकड़ें और 2 मिनट तक बिना सोचे-समझे जो मन में आये लिखते जाएं।

कुछ ऐसा बन सकता है:

“मुझे लिखने का मन नहीं है, लेकिन मुझे पानी पीना है, पर उठने का मन नहीं है, पर लिखना है, पर नहीं है…”

मजेदार है, पर काम करता है!

7.अपने आप पर कभी-कभी हंस भी लेना चाहिए

जब लिखने का मन नहीं होता, हम बेहद नाटकीय हो जाते हैं—

“ओह, मेरी क्रिएटिविटी सो गई है!”

“मेरे आइडियाज़ हड़ताल पर चले गए हैं!”

“शायद मैं लेखक बनने के लायक ही नहीं…”

हे भगवन! ऐसा सबके साथ होता है।

अपने नाटक पर हँसो… और फिर एक मजेदार ब्लॉग लिख डालो—जैसे अभी आपने ये पढ़ा।

हमें याद रखना चाहिए कि लिखना कोई दैनिक कृत्य नहीं है, जिसे रोज करना ही पड़े।

कभी-कभी लिखने का मन नहीं करता—ये बिल्कुल नॉर्मल है!

ऐसे में बस हल्के हो जाओ, थोड़ा हँसो, और कुछ भी लिख डालो।

लिखने का मन ना होने पर जो लिखा जाता है, वही अक्सर सबसे प्यारा, सबसे सच्चा और सबसे मजेदार बन जाता है।

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