श्रेष्ठ बल

श्रेष्ठ बल

- राजीव नयन पाठक 

प्यारे दोस्तों!

आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ जो हमें यह सिखाती है कि मनुष्य में असली शक्ति किसे कहा जाता है।

यह कहानी एक प्राचीन ऋषि और एक जिज्ञासु राजा की है - जिनकी बातचीत में जीवन का गूढ़ रहस्य छिपा है।

एक दिन, एक राजा अपने दरबार में बैठा सोच रहा था -

मेरे पास सेना है, धन है, मंत्री हैं, और एक महान वंश है — फिर भी मनुष्य का सबसे बड़ा बल कौन सा है?

उसी समय एक वृद्ध ऋषि दरबार में आए। राजा ने अभिवादन किया और कुशल क्षेम पूछने के बाद विनम्रतापूर्वक पूछा,

भगवन्, कृपा करके बताइए, मनुष्य के बल कितने प्रकार के होते हैं, और उनमें श्रेष्ठ कौन सा है?

ऋषि मुस्कुराए और बोले —

राजन्! मनुष्य में पाँच प्रकार के बल होते हैं। हर बल की अपनी जगह है, परंतु उनका महत्व भिन्न है। अब ध्यान से सुनो…

ऋषि बोले -

पहला बल है बाहुबल - अर्थात् भुजाओं की शक्ति।

यह शक्ति हमें श्रम करने, रक्षा करने और परिश्रम से कार्य पूर्ण करने की सामर्थ्य देती है।

परंतु, हे राजन्! यही सबसे कनिष्ठ बल है — क्योंकि केवल शरीर से चलने वाला बल सीमित होता है।”

ऋषि ने समझाया - यदि मन दृढ़ न हो, तो शरीर की शक्ति व्यर्थ है।

दूसरा बल है अमात्यलाभ - योग्य मंत्रियों या मित्रों का मिलना।

जिसे अच्छे सलाहकार मिलते हैं, उसका मार्ग सदा प्रकाशमय होता है।

राजन्, एक राजा अकेला नहीं जीतता - उसकी विजय उसके समझदार साथियों की देन होती है।

यही कारण है कि यह बल बाहुबल से श्रेष्ठ कहा गया है।

ऋषि ने आगे कहा -

तीसरा बल है धनलाभ। धन से न केवल सुख मिलता है,

बल्कि यह दूसरों की सहायता करने, राज्य चलाने, और संकट में सहारा देने का साधन भी है।

परन्तु याद रखना, धन केवल साधन है - उद्देश्य नहीं।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा -

चौथा बल है अभिजातबल।

यह वह प्राकृतिक बल है जो पिता और पितामह से प्राप्त होता है - वंश, कुल, और परिवार की प्रतिष्ठा का बल।

ऐसा व्यक्ति समाज में सम्मान पाता है क्योंकि उसके भीतर पूर्वजों का संस्कार और गौरव प्रवाहित होता है।

फिर ऋषि गंभीर हुए और बोले -

“अब सुनो, पाँचवाँ और सबसे महान बल - प्रज्ञाबल।

यह बुद्धि और विवेक की शक्ति है।

राजन्, यह वही बल है जिससे मनुष्य अन्य चारों बलों को संयोजित करता है।

बुद्धि ही वह सारथी है जो शरीर, मित्र, धन और कुल - इन सबको दिशा देती है।”

राजा ने ध्यान से सुनकर कहा -

“अब मैं समझ गया, ऋषिवर! शरीर, धन, मित्र और वंश — सब आवश्यक हैं, परन्तु यदि बुद्धि न हो, तो सब निरर्थक हो जाते हैं।”

ऋषि ने आशीर्वाद दिया -

“हे राजन्, अपनी प्रज्ञा को जाग्रत रखो। क्योंकि यही वह दीपक है जो अन्य सब शक्तियों को प्रकाशित करता है।”

जैसे रथ के पाँच घोड़े बिना सारथी के भटक जाएँ, वैसे ही बुद्धि के बिना सभी बल व्यर्थ हो जाते हैं।

अतः, कहा गया है-

"बुद्धिर्यस्य बलम् तस्य" ।

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(संदर्भ- महाभारत - उद्योग पर्व के  अध्याय 37 श्लोक संख्या 52-55)

बलं पञ्चविधं नित्यं पुरुषाणां निबोध मे। 

यत्तु बाहुबले नाम कनिष्ठं बलमुच्यते ॥ ५२ ॥ 

अमात्यलाभो भद्रं ते द्वितीयं बलमुच्यते । 

तृतीयं धनलाभं तु बलमाहुर्मनीषिणः ॥ ५३ ॥

 यत्त्वस्य सहजं राजन् पितृपैतामहं बलम् ।  

अभिजातबलं नाम तच्चतुर्थ बलं स्मृतम् ॥ ५४ ॥

येन त्वेतानि सर्वाणि संगृहीतानि भारत ।  

यद् बलानां बलं श्रेष्ठं तत् प्रज्ञाबलमुच्यते ॥ ५५ ॥

अर्थात- राजन् ! आपका कल्याण हो, मनुष्योंमें सदा पाँच प्रकारका बल होता है, उसे सुनिये। जो बाहुबल नामक बल है, वह कनिष्ठ बल कहलाता है; मन्त्रीका मिलना दूसरा बल है; मनीषी लोग धनके लाभको तीसरा बल बताते हैं; और राजन् ! जो बाप-दादोंसे प्राप्त हुआ मनुष्यका स्वाभाविक बल (कुटुम्बका बल) है, वह 'अभिजात' नामक चौथा बल है। भारत! जिससे इन सभी बलोंका संग्रह हो जाता है तथा जो सब बलोंमें श्रेष्ठ बल है, वह पाँचवाँ 'बुद्धिका बल' कहलाता है ॥ ५२-५५॥

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