कब जगेंगे मेरे हिय के राम

कब जगेंगे मेरे हिय के राम

- राजीव नयन पाठक 

गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस मानव जीवन के प्रत्येक स्तर को दिशा देने वाली एक जीवंत दर्शनशाला है। यह कथा जितनी सीता-राम की है, उतनी ही मानव-जीवन के आदर्शों की भी है। इसमें नीति, करुणा, संयम, और कर्म - चारों के बीच अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है।

तुलसीदास जी ने लिखा -

“परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।” (रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड)

यह दोहा केवल उपदेश नहीं है, बल्कि मानवता के मूल स्वभाव की ओर संकेत करता है। यहाँ “परहित” का अर्थ केवल दूसरों की सहायता करना नहीं, बल्कि दूसरों के सुख को अपना सुख मानना है। यही भाव जीवन को ऊँचा उठाता है - व्यक्तिगत स्वार्थ से लेकर लोकमंगल की ओर।

राजा दशरथ का वियोग एक गहन दार्शनिक प्रतीक है। वे केवल अपने पुत्र से वियोग में नहीं मरते - वे धर्म और मोह के संघर्ष में टूट जाते हैं। जब वे कहते हैं - "जिऐ मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना ।। 

कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ।। 

अर्थात- मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और सौंप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुःखी होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें जरा भी छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है॥ 

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना । जीवनु राम दरस आधीना ॥

हे चतुर प्रिये! जीमें समझ देख, मेरा जीवन श्री राम के दर्शन के अधीन है।"

तो यह केवल एक पिता का शोक नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के संबंध की अभिव्यक्ति है। राम यहाँ आत्मा के भीतर स्थित सत्य हैं, और दशरथ वह जीव जो उस सत्य से विच्छिन्न होकर जी नहीं सकता।

वन में सीता की स्थिति भी केवल एक परीक्षा नहीं है। यह स्त्री की आंतरिक शक्ति का उदाहरण है। रावण की लंका में भी वह विचलित नहीं होतीं, क्योंकि उनका विश्वास बाहरी स्थिति पर नहीं, भीतर के राम पर है। उनका संयम यह सिखाता है कि विपत्ति चरित्र का निर्माण करती है, नाश नहीं।

"तृन धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥

परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा) करके कहने लगीं -

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥ अस मन समुझ कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥

हे दशमुख! सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? तू अपने लिए भी ऐसा ही मन में समझ ले। रे दुष्ट ! तुझे रघुवीर के  बाण की खबर नहीं है ?" (सुन्दरकाण्ड)

यह पंक्ति स्त्री की मर्यादा का नहीं, बल्कि उसकी सामर्थ्य और विवेक का प्रतिपादन करती है - जहाँ सीता ‘परिस्थिति की दासी’ नहीं, ‘आस्था की रानी’ बन जाती हैं।

हनुमान जी का चरित्र “कर्म” का जीवंत प्रतीक है। उनका ज्ञान अपार था, परंतु उन्होंने कभी अहंकार नहीं दिखाया। जब सीता ने उन्हें आशीष दिया, तब हनुमान जी की प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं - 

"बार बार नाएसि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा ॥ 

अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता । आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥ 

अर्थात- हनुमान्‌जीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा- हे माता। अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है ।"

यह दिखाता है कि सच्चा कर्मयोगी वही है जो फल की इच्छा नहीं करता - वह केवल सेवा के आनंद में जीता है। यही गीता का संदेश भी है - “कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन।”

रामराज्य कोई राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति है - जहाँ हर व्यक्ति अपने धर्म का पालन करता है और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करता है। तुलसीदास जी के शब्दों में -

“दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, रामराज नहिं काहू व्यापा।”

यह केवल एक राज्य का वर्णन नहीं, बल्कि आत्मा की उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ संतुलन, सत्य और करुणा का वास होता है।

रामचरितमानस के पात्र हमारे भीतर हैं -

दशरथ हमारी भावना है,

राम हमारा विवेक,

सीता हमारी शुद्धता,

लक्ष्मण हमारी निष्ठा,

हनुमान हमारा कर्म,

और रावण हमारा अहंकार।

जब अहंकार का नाश होता है, तभी भीतर का अयोध्या (जहाँ युद्ध नहीं) प्रकट होती है।

और तब हर मनुष्य कह सकता है -

“मेरे भीतर के राम अब जग गये हैं।”

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जय श्री राम

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