संस्कृत शब्द-सृष्टि की अनंत यात्रा
संस्कृत शब्द-सृष्टि की अनंत यात्रा
-राजीव नयन पाठक
संस्कृत के साथ बिताए गए पाँच दशकों से अधिक समय ने यह बार-बार सिद्ध किया कि यह केवल भाषा नहीं, बल्कि विचार और चेतना का जीवित माध्यम है। शब्द यहाँ केवल ध्वनि नहीं, बल्कि सृष्टि के बीज हैं।
धातु शब्द का बीज है। संस्कृत की नींव है—धातु। लगभग दो हज़ार धातुएँ, जो क्रियाओं और शब्द-सृजन की जड़ हैं।
आचार्य भर्तृहरि ने वाक्यप्रदीप में लिखा है:
"अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रपञ्चोऽयमुदाहृतः॥"
"शब्द ही अनादि और अनंत ब्रह्म है, जो अर्थ के रूप में प्रकट होकर इस संसार का विस्तार करता है।"
व्याकरण महाभाष्य के प्रथम आह्निक में आचार्य पाणिनि ने बताया है कि:
एवं हि श्रूयते - बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम ।
"देवगुरु बृहस्पति ने एक हज़ार दिव्य वर्षों तक इन्द्र को प्रतिपदोक्त शब्द-पारायण पढ़ाया, पर समाप्ति तक न पहुँचे। बृहस्पति जैसा पढ़ाने वाला हो, और इन्द्र जैसा पढ़नेवाला शिष्य हो, तब भी एक हज़ार दिव्य वर्ष पढ़ने का समय समाप्त नहीं हुआ।" एक पार्थिव वर्ष देवताओं के लिए अहोरात्र होता है। एक दिव्य वर्ष में 365 पार्थिव वर्ष होते हैं।आजकल का तो कहना ही क्या—जो बहुत लंबा जीवन जीता है वह पार्थिव सौ वर्ष तक जीता है।
यह उद्धरण स्पष्ट रूप से दिखाता है कि संस्कृत की शब्द-सृष्टि अनंत है।
उपसर्ग और प्रत्यय एक शब्द को अनेक शब्दों में प्रकट कर उनके विशेषार्थ और उनमें विशिष्टता देते हैं।
धातु पठ् (पढ़ना) उदाहरण लें:
पाठकः – पाठक
पाठनम् – अध्ययन
पाठ्यः – पढ़ने योग्य
धातु स्था (खड़ा होना) + उपसर्ग:
प्रतिष्ठा – आधार, सम्मान
अवस्थानम् – स्थिति
उत्स्थानम् – उठना
निष्ठा – दृढ़ता
संस्कृत में समास शब्द निर्माण की एक अनूठी कला है।
रामस्य मित्रम् = राममित्रम्
नदीनां पतिः = नदीपतिः
कालिदास ने इसी संक्षिप्तता और माधुर्य का अद्भुत उपयोग किया:
"वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
“ जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥"
"जैसे वाणी और अर्थ अभिन्न हैं, वैसे ही पार्वती और परमेश्वर।"
वैदिक ऋचाएँ वेदों में शब्द-सृष्टि और अर्थ की गहनता दर्शाती है।
ऋग्वेद 10.129.1 – नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमाभिव्यः।
"न तो उस समय कुछ था, न वह काल था, न वह आकाश था, न पृथ्वी; सभी अस्तित्व और अ-अस्तित्व के बीच की स्थिति अज्ञात थी।"
ऋग्वेद 1.1.1 – अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
"अग्नि को हम पुजारी मानकर यज्ञ में आमंत्रित करते हैं।"
वेदों में हर शब्द अनेक अर्थों में व्याप्त है; उपसर्ग और प्रत्यय की तरह, वेद स्वयं शब्द-सृष्टि की जीवित प्रयोगशाला हैं।
संस्कृत आज भी नई अवधारणाओं और विज्ञान के लिए सक्षम भाषा है:
Computer = सङ्गणकः
Television = दूरदर्शनम्
University = विश्वविद्यालयः
यह केवल अनुवाद नहीं; यह भाषा की सृजनात्मक क्षमता का प्रमाण है।
संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, यह भविष्य की भी धुरी है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ‘’संस्कृत साहित्य की वाणी में वह गहनता और गंभीरता है, जो किसी भी सभ्यता को आत्मबोध कराने में समर्थ है।”
जयतु संस्कृतम् ।जयतु भारतम्।
🙏
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