शिवरात्रि

शिवरात्रि

मैं गुरुद्रुह हूँ… हाँ वही भील, जिसका नाम सुनते ही लोग डरते थे। मेरा जीवन कैसा था, यह मैं खुद कहूँ तो शायद आप विश्वास न करें। बचपन से ही शिकार, चोरी, क्रूरता—बस यही मेरा संसार था। मुझे न पूजा का ज्ञान था, न किसी धर्म का। जंगल ही मेरा घर था, और शिकार ही मेरा धर्म। परिवार बड़ा था—माता-पिता, पत्नी, बच्चे—पर उनकी भूख मिटाना ही मेरा एकमात्र उद्देश्य था। मैं यह नहीं सोचता था कि जो कर रहा हूँ, वह सही है या गलत। बस पेट भरना, यही मेरी दौड़ थी।

फिर एक दिन… एक दिन आया, जो मेरी पूरी ज़िन्दगी बदल गया। वह दिन था शिवरात्रि का। पर मैं क्या जानता था कि वह दिन इतना विशेष है! उस दिन घर में बच्चे रो रहे थे, माता-पिता और पत्नी बार-बार कह रही थीं—“हमें कुछ खाने को दो!” मेरा दिल घबरा गया। धनुष उठाया और शिकार की खोज में निकल पड़ा। पूरे दिन जंगल में दौड़ता रहा, पर कोई शिकार नहीं मिला। सूरज ढल गया, मन में बेचैनी भर गई। सोचता रहा—“अब क्या करूँ? घर जाकर क्या कहूँ? सब भूखे हैं… मैं खाली हाथ कैसे लौटूँ?”

आख़िर थक हारकर मैं एक तालाब के पास पहुँचा। वहाँ एक बेल का पेड़ था। मैंने सोचा—“यहाँ कोई न कोई जानवर ज़रूर पानी पीने आएगा। उसे मारकर घर ले जाऊँगा। नहीं तो सब भूखे रह जाएँगे।” यह सोचकर मैं पेड़ पर चढ़ गया। भूखा, प्यासा, थका—बस इंतजार करता रहा। मन में यही था—“कब कोई आएगा? कब मैं उसे मारूँगा?”

रात का पहला पहर आया। तभी एक हरिणी पानी पीने आई। मेरे मन में खुशी दौड़ गई। मैंने तीर साधा। जैसे ही बाण चढ़ाया, हाथ का धक्का लगा और थोड़ा जल और बेलपत्र नीचे गिर पड़े। नीचे क्या था, मुझे तब पता नहीं चला… पर बाद में जाना कि वहाँ शिवलिंग था। मेरे हाथ से गिरा जल और बेलपत्र भगवान शिव की पूजा में शामिल हो गया। पहले पहर की पूजा सम्पन्न हुई। मुझे इसका ज्ञान नहीं था, पर भीतर कुछ हल्का-हल्का महसूस हुआ… जैसे कुछ मेरे मन पर से उतर रहा हो।

हरिणी डरकर ऊपर देखने लगी—“व्याध! तुम क्या कर रहे हो?”

मैंने कहा—“मेरे परिवार वाले भूखे हैं। तुम्हें मारकर उनका पेट भरूँगा।”

वह काँप गई, पर फिर शांत स्वर में बोली—“व्याध! यह शरीर नश्वर है। अगर इससे किसी का भला हो तो इससे बड़ा पुण्य क्या होगा! लेकिन मेरे छोटे-छोटे बच्चे घर में हैं। मैं उन्हें अपने स्वामी और बहन के पास छोड़कर लौट आऊँगी। मैं सत्य बोलती हूँ। सत्य से ही पृथ्वी टिकी है, समुद्र स्थिर है, जल बहता है। मैं लौटूँगी—इसमें कोई संदेह नहीं।”

उसकी बात सुनकर मैं दुविधा में पड़ा। क्या यह सच कह रही है? या झूठ बोलकर भाग जाएगी? फिर भी, मैंने बाण नहीं चलाया। वह चली गई।

रात का दूसरा पहर आया। दूसरी हरिणी पानी पीने आई। फिर वही! मैंने बाण साधा, हाथ का धक्का लगा, जल और बेलपत्र गिरा। शिव की पूजा पूर्ण हुई। हरिणी ने भी लौट आने का वचन दिया। पर मैं विश्वास नहीं कर रहा था। फिर भी… मैंने बाण नहीं चलाया।

तीसरा पहर आया। वह नहीं लौटी। बेचैनी बढ़ी। तभी मैंने एक बलशाली हिरण को देखा। मन में लालच दौड़ा। बाण चढ़ाया… पर जैसे ही बाण साधा, वही हुआ! जल और बेलपत्र गिर पड़े और पूजा सम्पन्न हुई। हिरण ने पूछा—“व्याध! क्या कर रहे हो?”

मैंने कहा—“परिवार के लिए भोजन जुटाना है।”

हिरण बोला—“यदि मैं लौटकर न आऊँ तो मुझे वही पाप लगे जो बिना पूजा भोजन करने वाले को लगता है।”

उसकी बात सुनते ही मेरे भीतर कुछ हिल गया। क्या सचमुच मैं गलत कर रहा हूँ? क्या ये पशु मुझसे ज्यादा धर्म जानते हैं? मैं चुप रह गया।

फिर चौथा पहर आया। तब तक रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी थी। मैं सोच ही रहा था कि कहीं ये सब लौटें भी या नहीं… तभी दूर से आवाज़ आई। पहले हरिणी आई… फिर दूसरी… फिर हिरण… और उनके साथ उनके बच्चे भी! मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। सबने कहा—“हम लौटे हैं, व्याध! अपने वचन को निभाने!”



मेरे मन में कुछ टूट गया। मैंने बाण साधा… पर जैसे ही साधा, जल और बेलपत्र गिर गए और पूजा सम्पन्न हुई। मेरे सारे पाप जैसे धुल गए। मैं स्तब्ध रह गया। मेरे सामने ये नश्वर प्राणी अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर लौटे थे।

तब मेरे भीतर पछतावा जागा। मैंने सोचा—“ये तो पशु हैं, फिर भी वचन निभाते हैं। मैं मनुष्य होकर कितना पतित हूँ! मैंने जीवनभर पाप किया। किस पुरुषार्थ का साधन किया? अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का अहित किया।” मेरे हाथ काँप गए। बाण रोक लिया। आँखें भर आईं। मैंने कहा—“जाओ… तुम्हारा जीवन धन्य है।”

तभी मेरे सामने तेजस्वी प्रकाश प्रकट हुआ। भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए। मैंने पहली बार उन्हें देखा। उनका रूप दिव्य था। उन्होंने कहा—“भील! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। वर माँगो।”

मैं निःशब्द था। हाथ जोड़कर गिर पड़ा। कहा—“भगवन! मुझे कुछ नहीं चाहिए। आपके चरणों में गिरकर मैं सब पा चुका।”

भगवान शिव ने मुझे ‘गुह’ नाम दिया। वरदान दिया—“तुम शृंगवेरपुर में राज्य करो। तुम्हारा वंश बढ़े। देवता तुम्हारी प्रशंसा करें। श्रीराम स्वयं तुम्हारे घर आएँ। अंत में तुम मेरे सायुज्य मोक्ष को प्राप्त करो।”

इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए। मृग-मृगियाँ दिव्य रूप लेकर स्वर्ग को चली गईं। और मैं… मैं भी बदल गया। मेरा जीवन उसी दिन से नया हो गया। मैंने समझा—भक्ति कोई दिखावा नहीं। पूजा का अर्थ है सेवा, दया और सत्य। यदि मन सच्चा हो, तो भगवान स्वयं आकर जीवन को प्रकाश से भर देते हैं।

जय बाबा शुम्भेश्वरनाथ!

हर हर महादेव!

🙏

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