नींद, स्वप्न, मृत्यु, जागरण और जन्म
नींद, स्वप्न, मृत्यु, जागरण और जन्म
उपनिषदों की दृष्टि में नींद, स्वप्न, मृत्यु, जागरण और जन्म—ये अलग-अलग घटनाएँ नहीं, बल्कि चेतना की अवस्थाएँ हैं।
जाग्रत अवस्था (जागरण) में आत्मा बाह्य इन्द्रियों के माध्यम से जगत को अनुभव करती है। माण्डूक्य उपनिषद इसे वैश्वानर कहता है—
“जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः… वैश्वानरः” (माण्डूक्य उपनिषद 3)
स्वप्न अवस्था में इन्द्रियाँ शान्त हो जाती हैं, पर मन सक्रिय रहता है। वही आत्मा अंतःकरण के चित्र रचती है—
“स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः… तैजसः” (माण्डूक्य उपनिषद 4)
बृहदारण्यक उपनिषद बताता है कि स्वप्न में आत्मा स्वयं ही कर्ता और भोक्ता बन जाती है—
“स्वयं ज्योतिः भवति” (बृहदारण्यक 4.3.9)
सुषुप्ति (गहरी नींद) में न स्वप्न रहता है, न इच्छा; पर आत्मा नष्ट नहीं होती। वह आनन्दमय बीज रूप में स्थित रहती है—
“यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते… तत् सुषुप्तम्” (बृहदारण्यक 4.3.19)
माण्डूक्य इसे प्राज्ञ कहता है—
“एकीभूतः प्रज्ञानघन एव आनन्दमयः” (माण्डूक्य 5)
मृत्यु को उपनिषद पूर्ण विराम नहीं, बल्कि गहरी सुषुप्ति जैसा संक्रमण मानते हैं। कठोपनिषद स्पष्ट करता है—
“न जायते म्रियते वा विपश्चित्” (कठ 2.18)
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है—देह बदलती है।
जन्म उस चेतना का पुनः जागरण है, जहाँ कर्म और संस्कार नया शरीर धारण करते हैं। छान्दोग्य उपनिषद सुषुप्ति से जागरण की उपमा देकर पुनरागमन का संकेत देता है—
“स यथा सुषुप्तः प्रबुद्धः…” (छान्दोग्य 6.8–6.10)
इस प्रकार, नींद एक लघु मृत्यु है, स्वप्न अंतर्जगत की यात्रा, मृत्यु दीर्घ सुषुप्ति, और जन्म फिर से जागरण। उपनिषद हमें सिखाते हैं कि बदलती हैं अवस्थाएँ, पर आत्मा सदा जाग्रत रहती है—नित्य, शान्त, साक्षी।
***
सन्दर्भ
माण्डूक्य उपनिषद – मंत्र 3 (जाग्रत अवस्था)
जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः
स्थूलभुग् वैश्वानरः प्रथमः पादः॥
माण्डूक्य उपनिषद – मंत्र 4 (स्वप्न अवस्था)
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः
प्रविविक्तभुक् तैजसः द्वितीयः पादः॥
माण्डूक्य उपनिषद – मंत्र 5 (सुषुप्ति अवस्था)
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते
न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम्।
सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एव
आनन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञः तृतीयः पादः॥
बृहदारण्यक उपनिषद – 4.3.9 (स्वप्न में आत्मा स्वयं ज्योति)
तत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति॥
बृहदारण्यक उपनिषद – 4.3.19 (गहरी नींद)
यत्र ह्येवैष एतस्मिन् अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने
अभयं प्रतिष्ठां विन्दतेऽथ सोऽभयं गतो भवति।
यदा ह्येवैष एतस्मिन् उदरमन्तरं कुरुते
अथास्य भयं भवति॥
(सुषुप्ति की अवस्था का दार्शनिक विवरण)
कठोपनिषद – 2.18 (आत्मा का न जन्म, न मृत्यु)
न जायते म्रियते वा विपश्चित्
नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
छान्दोग्य उपनिषद – 6.8.1 (सुषुप्ति और पुनर्जागरण का संकेत)
उद्दालको ह वै श्वेतकेतुमुवाच—
यदा सोम्य पुरुषः स्वपिति
सताऽसम्पन्नो भवति
स्वमपीतो भवति
तस्मात् स्वपितीत्याचक्षते॥
ये मंत्र मिलकर उपनिषदों की वह सम्पूर्ण दृष्टि प्रस्तुत करते हैं, जहाँ
नींद — अल्प सुषुप्ति,
मृत्यु — दीर्घ सुषुप्ति,
और जन्म — पुनः जागरण है,
जबकि आत्मा सदा अचल, साक्षी और अमर रहती है।
Comments
Post a Comment
Please Leave a comment/review. Thanks