भोज-भात

भोज-भात

-राजीव नयन पाठक

भोज-भात में बैठने का मज़ा ही कुछ और है। आँगन में लंबी कतार में पत्तलें बिछी हैं, लोग आसन जमाकर बैठ गए हैं, बच्चे सबसे आगे, बुजुर्ग बीच में, और जवान लोग इधर-उधर हँसी-ठिठोली करते हुए। सबकी नज़र रसोई की तरफ़ है, क्योंकि अब शुरू होने वाला है — परोसने का अद्भुत काम जिसमें हिस्सा लेते हैं गांव के नवयुवक।


सबसे पहले आता है गरमा-गरम भात — भाप उठता हुआ, सीधा पत्तल में गिरता है। परोसने वाले हत्था से थोड़ी सावधानी पूर्वक पत्तल पर परोसते हैं। उसके बाद शुरू होती है - सब्जियां।

पहले आलू की सब्ज़ी, फिर कद्दू, फिर चना, फिर बैगन, फिर बारी-बारी से और कई-कई तरह की सब्ज़ियाँ। हरी-हरी साग, कुरकुरे पकौड़े, मसालेदार तरकारी, पापड़, सलाद, अचार — थाली भरकर रंग-बिरंगी हो जाती है।

लेकिन मज़े की बात यह है कि अभी भी कोई खाना शुरू नहीं करता। सबके हाथ अपनी जगह पर टिके हैं, और नज़र सिर्फ एक तरफ़ — जहाँ से दाल और घी आने वाला है।

अब आता है वो पल जिसका इंतज़ार सबको था — सबसे पहले गरमागरम दाल। भात के ऊपर दाल ऐसे डालते हैं कि भाप उठकर नाक तक पहुँच जाए और सुगंध दिल में उतर जाए। और फिर… फिर आता है राजा — घी! चमचमाता पीतल का लोटा, जिसमें सुनहरा घी भरा है। दाल के ऊपर जैसे ही घी गिरता है, थाली में मानो त्योहार उतर आता है। उस पल के बाद ही लोग पहला कौर उठाते हैं — जैसे कोई घंटी बजी हो, “अब शुरू किया जाय!”

बड़े बुजुर्ग अपने दाहिने हाथ की अंजलि में जल लेकर पत्तल के चारों ओर थोड़ा-थोड़ा गिरते हुए भगवान को समर्पित करते हैं और फिर भोजन की शुरुआत करते हैं जिसका अनुसरण पंक्ति में बैठे अन्य लोग करते हैं।

खाने के बीच में पकौड़े का कुरकुरापन, अचार की तीखी चुटकी, और पापड़ का चर्र-चर्र — सब मिलकर भूख को और बढ़ाते हैं। और जब थाली लगभग खाली हो जाती है, तब  परोसा जाता है - मलाईदार दही।  दही खाकर मन ही नहीं आत्मा भी तृप्त हो जाती है।

बचपन के दिनों में, मैं पत्तल पर बैठकर बस घी आने का इंतज़ार करता था। दाल-घी का पहला कौर लेते ही जो तृप्ति मिलती थी, वो न मिठाई से मिलती है, न पान से। और दही के साथ जब भोज खत्म होता, तो लगता था जैसे  पूर्ण संतुष्टि मिल गई हो ।

इसीलिए तो गाँव में भोजन के लिए कहा जाता है —

शुरू मे घी अन्त मे दही, एहि भोजन के भोजन कही।

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जय हिंद

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