उपेक्षित रोटियाॅं
उपेक्षित रोटियाॅं
भोजन केवल भूख मिटाने का माध्यम नहीं है; यह प्रेम, परिश्रम और त्याग का सजीव प्रतीक है। जब भोजन का अनादर होता है, तो उसके साथ उन भावनाओं का भी अपमान होता है जो उसे आकार देती हैं।
एक दिन विद्यालय परिसर में मेरा ध्यान उन पेड़ों की ओर गया, जिनके नीचे बच्चे बैठकर अपना दोपहर का भोजन करते हैं। वहां, वृक्षों की जड़ों में और समीप बने एक गड्ढे में, कई रोटियां बिखरी हुई थीं — कुछ सूखी, कुछ अधखाई, कुछ उपेक्षित। यह दृश्य मात्र रोटियां की बर्बादी का नहीं था; यह एक गहरे भावनात्मक पतन का द्योतक था।
आज के बच्चों के स्वाद बदल रहे हैं। माॅं के हाथों की बनी साधारण, सादगीपूर्ण रोटियों के स्थान पर अब बाजार से आए फास्ट फूड, इंस्टेंट नूडल्स और चटपटे पैकेटबंद खाद्य पदार्थों ने स्थान ले लिया है। यह परिवर्तन केवल भोजन में ही नहीं, अपितु यह एक मानसिक और भावनात्मक परिवर्तन भी है।
यह उन अबोध बालकों की वह भावनात्मक अनभिज्ञताजन्य बर्बादी है, जो उन्हें प्रेम, श्रम और सादगी के प्रति संवेदनशील बनने से वंचित कर रही है। जब कड़ी मेहनत से तैयार किया गया भोजन सहज उपलब्ध होता है, तो उसके प्रति सम्मान स्वतः कम होने लगता है। वही रोटी, जो किसी भूखे के लिए जीवनदान है, सुविधा के दौर में तुच्छ प्रतीत होने लगती है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी वस्तु का मूल्य तभी समझा जाता है जब उसकी अनुपस्थिति का अनुभव होता है।
आज जो रोटियां उपेक्षित पड़ी हैं, कल जब जीवन कठिनाइयों और जिम्मेदारियों से भर जाएगा, तब वही रोटियां याद आएंगी — मां के स्पर्श की तरह, घर की ऊष्मा की तरह।
उन रोटियों में केवल आटा और पानी नहीं था। उसमें एक माॅं की ममता, एक पिता की तपस्या, और एक परिवार की निस्वार्थ भेंट समाहित थी। वह हर रोटी, हर टुकड़ा — अनगिनत अनकहे सपनों और आशाओं का प्रतीक था। आज जब उन्हें बिखरे देखा, तो ऐसा लगा मानो प्रेम स्वयं धूल-धूसरित पड़ा हो।
जीवन की वास्तविक पूंजी वही प्रेम, वही त्याग, वही स्नेह है जिसे हम अक्सर बचपन में अनजाने में ठुकरा देते हैं। बड़े होकर जब जीवन के थपेड़े सहने पड़ते हैं, जब कंधों पर जिम्मेदारियों का भार आता है, तब इन सूक्ष्म अनुभूतियों का मूल्य हृदयंगम होता है।
वहां बिखरी रोटियां केवल एक दृश्य नहीं थीं; वे एक मौन चेतावनी थीं !

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